रक्षाबंधन क्यों मनाया जाता है? ऐतिहासिक महत्त्व एवं इससे जुड़ी कहानियां

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रक्षाबंधन का त्योहार

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। ऐसा ही एक त्यौहार है रक्षाबंधन, जो त्योहार भाई और बहन के पवित्र रिश्ते और स्नेह की डोर को बांधता है। यह भारतीय धर्म संस्कृति के अनुसार श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रक्षाबंधन के इस पावन त्योहार पर बहनें अपने भाई के मस्तक पर विजय तिलक लगाकर दायें हाथ की कलाई पर रक्षा का बन्धन बांधती हैं, जिसे राखी कहते हैं। साथ ही साथ बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और प्रत्येक समय उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि राखी के रंग-बिरंगे धागे भाई-बहन के स्नेह के बंधन को मजबूत करते हैं। इस प्रकार यह एक ऐसा पावन पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है।

सगे भाई बहन के अतिरिक्त अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से बंधे हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे हैं। यह पर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के निवास पर भी मनाया जाता है। जहाँ पर छोटे छोटे बच्चे जाकर उन्हें राखी बांधते हैं। यह पर्व स्नेह के बंधन से रिश्तों को मजबूती देता है अतः इस अवसर पर न केवल बहन अपने भाई को बल्कि बुआ अपने भतीजों को, गुरु अपने शिष्य को भी रक्षासूत्र बांधते हैं। अब तो वृक्षों को भी राखी बांधने की परम्परा शुरू हो गयी है ताकि प्रकृति संरक्षित रह सके।

मनाये जाने का कारण

राखी के त्योहार को मनाये जाने की कई कथाएं प्रचलित है, जिसमें से कुछ इस प्रकार हैं-

  1. दानवों के राजा बलि ने जब 100 यज्ञों को पूर्ण करके स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहा, तब इंद्र समेत सभी देवता भगवान विष्णु के शरण में गए और उनसे स्वर्ग रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। उनकी प्रार्थना स्वीकार कर भगवान विष्णु, वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेश धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने उन्हें तीन पग भूमि दान कर दिया। भगवान वामन ने तीन पग में सारा आकाश तथा धरती को नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। तब बलि ने भगवान की भक्ति कर रात-दिन अपने सामने रहने का वरदान माग लिया। वैकुण्ठ न लौटने से परेशान माता लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया जिसका पालन करते हुए लक्ष्मी जी बलि के पास जाकर उसे रक्षाबंधन बांधकर अपना भाई बना लेती हैं तथा बलि को राजी कर भगवान विष्णु को लेकर वैकुण्ठ लौट आती हैं। उस समय श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। अतः हम इसी दिन इस पर्व को भाई बहन के पर्व के रूप में मनाते हैं।
  2. एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी की कथा का वर्णन है। इसके अनुसार, जब भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी अंगुली थोड़ी सी कट गयी तभी द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। यह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। इसके बदले में जब द्रौपदी का भरी सभा में चीरहरण किया जा रहा था तब भगवन श्री कृष्ण ने उनकी साड़ी को बढ़ाकर उनके सम्मान की रक्षा की थी। अतः कहते हैं कि एक-दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना से परिपूर्ण रक्षाबंधन के पर्व की शुरुआत यहीं से हुई।
  3. भविष्य पुराण में भी इसके बारे में वर्णन देखने को मिलता है। इसके अनुसार, देवताओं और दानवों में जब युद्ध प्रारम्भ होता है तब दानव देवताओं पर हावी हो जाते हैं। तब देवराज इंद्र घबराकर देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गए तथा सारी बातें बताई। वहीं पास में उपस्थित इंद्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही होती हैं तथा रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके पति के हाथ पर बांध देती हैं। यह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इंद्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से विजयी हुए थे। अतः तभी से धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा यश, शक्ति, हर्ष तथा विजय देने में पूर्णरूप से समर्थ मना जाता है।

ऐतिहासिक घटनाएँ

जब युद्ध के मैदान में राजपूत जाते थे तब महिलाएं उनके मस्तक पर तिलक लगाकर हाथों की कलाई में रेशमी धागे को बांध देती थीं। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें विश्वास था कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस लायेगा। इसके साथ ही एक और ऐतिहासिक घटना देखने को मिलती है कि जब मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा उनके राज्य मेवाड़ पर हमला करने की पूर्व सूचना मिली, तब कर्मावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर रक्षा की माँग की। बादशाह हुमायूँ मुसलमान होते हुए भी कर्मावती के द्वारा भेजी गयी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुँचकर मेवाड़ की तरफ से बहादुरशाह के विरुद्ध युद्ध किया तथा कर्मावती और उनके राज्य की रक्षा की। अतः

इस राखी के पर्व को धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे सुख, समृद्धि, यश और विजय का पावन पर्व कहा जाता है। रक्षाबंधन सामाजिक और पारिवारिक एकसूत्रता का भी पर्व है। घर के लक्ष्मी के रूप में मानी जाने वाली लड़कियाँ जब विवाह के पश्चात ससुराल चली जाती हैं तब इस पर्व के बहाने प्रतिवर्ष केवल अपने सगे ही नहीं बल्कि दूरदराज के रिश्तों के भाइयों को भी उनके घर जाकर उनके हाथों की कलाई पर राखी बांधती हैं और अपने भाई बहन के रिश्तों को स्नेह और प्रेम से परिपूर्ण करती रहती हैं। इस प्रकार दो परिवारों का भी परस्पर मिलन होता है। अतः इसे एकसूत्रता के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।

रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त (2022)

रक्षाबंधन का त्योहार हिन्दू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 11 अगस्त, गुरूवार के दिन पूर्वाह्न 10 बजकर 38 मिनट से प्रारम्भ होकर अगले दिन 12 अगस्त को सुबह 7 बजकर 5 मिनट तक रहेगा। जैसा की कोई भी त्योहार सूर्य उदायातिथि के हिसाब से मनाया जाता है अतः इस बार 2022 में रक्षाबंधन का पर्व 11 अगस्त को मनाया जायेगा।

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